तेल की नौकरी – अशोक पाण्डेय 

शिरीन एक पढ़ा लिखा आदमी था। वह बहुत सीधा-साधा, मेहनती और ईमानदार आदमी था। नई नई नौकरी  साहब के दफ्तर में लगी थी। शिरीन समय से दफ्तर आता और सभी काम को इमानदारी पूर्वक निपटारा करता शाम को समय से अपने घर चले जाता था। दीमा जो शिरीन का सहकर्मी था। लेट लतीफ आने वाला एक नंबर का आलसी और चिकनी चुपड़ी बातें बनाने वाला अन्न का दुश्मन। जिसे साहब बहुत पसंद करते थे। और शिरीन को हमेशा डांटते रहते थे। जिस कारण शिरीन इमानदारी से नौकरी करने के बावजूद भी खुश नहीं रहता था। यह बातें दफ्तर के अन्य कर्मचारियों को बताया।।दफ्तर के कर्मचारियों  के अनुसार साहब को तेल पसंद है। कर्मचारियों ने शिरीन को बताया की साहब को अच्छी क्वालिटी का तेल पसंद है। अतः शिरीन दफ्तर के काम अच्छी तरह से निपटाने के बाद तरह-तरह के तेल साहब के लिए ला दिया करता है। साहब सोचने लगे कि शिरीन यह तरह-तरह का तेल क्यों ला रहा है। उसको तेल का मतलब नहीं मालूम था। वह साहब को रोज और नए नए  तेल के बारे में बताया करता था। साहब गुस्साकर उसको दफ्तर से निकाल दिए। शिरीन ने सोचा कि मैं तो अपना काम ईमानदारी से करता हूं फिर आप गुस्सा क्यों हो रहे हैं और हम को दफ्तर से क्यों निकाल दिये। और दिमा पर बहुत खुश रहते हैं । फिर दफ्तर के कर्मचारियों ने शिरीन को बताया कि तेल का मतलब वास्तविक तेल नहीं होता है। साहब के निजी स्वार्थ का ख्याल रखो। उनसे चिकनी चुपड़ी बातें करो, उनके हां में हां मिलाया करो, उनके चाय नाश्ता का ख्याल रखो, उनके ड्रेस कोडिंग की तारीफ किया करो और कभी कभार कुछ गिफ्ट भी दिया करो जिसे साहब तुम पर बहुत खुश रहेंगे और तुम्हारी नौकरी पक्की रहेगी। । दफ्तर में काम कम करोगे तो भी  चलेगा अगर साहब के निजी स्वार्थ का ख्याल रखते हो तो तुम्हें इतना मेहनत नहीं करना पड़ेगा। शिरीन की नैतिक मूल्यों को बहुत चोट पहुंचा इस बात से लेकिन बेरोजगारी के कारण वह यह नए तरह के तेल के लिए तैयार हो गया ‌। फिर क्या साहब के पास जाकर गिड़गिड़ाया और पुनः नौकरी साहब के दफ्तर में लगी। अब शिरीन नए तरह के तेल लेकर तैयार है और दफ्तर में काम कम करने के बावजूद भी शिरीन की नौकरी मजे से चलने लगी। शिरीन बहुत खुश था । तेल और पढ़ाई का प्रभाव इतना ज्यादा हुआ की बहुत जल्द शिरीन का पदोन्नति हो गई। उसको साहब के बगल में ही कुर्सी मिल गई।पहले तो तेल नीचे से ऊपर जाता था अब तो ऊपर से नीचे भी आने लगा है। अब साहब शिरीन को तेल मारने लगे।  कुछ दिनों के बाद क्या हुआ साहब अपना काम शिरीन को सौंप देते हैं और खुद आराम करते हैं ‌। शिरीन को साहब वाली फिलिंग आने लगी। अब शिरीन अन्य कर्मचारियों पर रौब दिखाता। साहब कभी दफ्तर आते हैं कभी नहीं आते घर से ही नौकरी हो जाती । और शिरीन तेल के दम पर साहब बन बैठा। साहब की चकाचक।
नोट: यह कहानी और कहानी के सभी पात्र पूरी तरह से काल्पनिक है। अगर इस कहानी से किसी को ठेस पहुंचे तो उसके लिए मैं  क्षमा प्रार्थी हूं।

– अशोक पाण्डेय

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