सतत और जैविक खेती एक बेहतर विकल्प – श्याम नन्दन पाण्डेय

भारत एक कृषि प्रधान देश है लगभग 50-52 प्रतिशत जनसँख्या की जीविका खेती पर निर्भर है। शुरू से ही हम देसी अथवा टिकाव खेती करते आ रहे हैं साथ साथ सतत कृषि (sustainable Farming) को हमेशा से मुख्य धारा में रही है जिसके अंतर्गत प्राकृतिक संसाधनो का कम से कम प्रयोग कर अधिक उत्पादन जैसे जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल फसल व फसल पद्धति को बढ़ावा देना, सिंचाई की प्रभावी पद्धति, भुसमतलीकरण, मेंड़बंदी, मल्चिंग, रिज एवं कुंड पद्धति इत्यादि जैसी कम जल प्रयोग और और नमी संरक्षण की तकनीकों को प्रयोग में लाते रहे हैं पर जैसे-जैसे जनसँख्या बढ़ती गयी खाद्य संकट से उबरने के लिए हरित क्रांति शुरू हुई और उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक मात्रा में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग करने लगे नए बीज लाये गए जिसके परिणाम स्वरूप लागत बढ़ी, तमाम रोग और बीमारियां बढ़ी भूमि, वायु और पर्यावरण सब पर बुरा असर पड़ रहा है और जमीन मृत होती जा रही है और एक समय ऐसा आ जायेगा और कोई भी फसल पैदा नही होगी कई देशों का ये हाल हो चुका है, दुनिया की लगभग 40% कृषि भूमि गंभीर रूप से बंजर हो गयी है। अब हमें जरूरत है फिर से देसी (टिकाऊ) खेती की जिसे जैविक खेती के नाम से जानते हैं को अपनाने की जिससे वायु, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण फायदे के साथ साथ जमीन को आवश्यक पोषक तत्व देकर रिचार्ज कर देती है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति जीवाणुओं की मात्रा एवं क्रियाशीलता पर निर्भर रहती है क्योंकि बहुत सी रासायनिक क्रियाओं के लिए सूक्ष्म जीवाणुओं की आवश्यकता रहती है। जीवित व सक्रिय मिट्टी वही कहलाती है जिसमें अधिक से अधिक जीवांश हो। जीवाणुओं का भोजन प्राय: कार्बनिक पदार्थ ही होते है और इनकी अधिकता से मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर प्रभाव पड़ता है।
यह बात स्वाभाविक है कि एक अरब 30 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या वाले देश में कृषि प्रणाली में बदलाव एक सुविचारित प्रक्रिया द्वारा होनी चाहिए, जिसके लिए काफी सावधानी और सतर्कता बरतने की जरूरत है।
जैविक खेती एक तरीका है एक सिस्टम (पद्धति) है जिसके कंपोनेंट्स (घटकों) वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद्य),ग्रीन मैनुवर (हरी खाद), क्रॉप रोटेशन ( फसल चक्र), बायोलोजिकल मैनेजमेंट (जैव प्रबन्ध), बायो फेर्टिलाज़र्स (जैव खाद), एनिमल हसबेन्डरी (पशु पालन), और मनुवर्स (पशु खाद) जमीन, जानवर ,वायु, पर्यावरण और मनुष्य सब को पोषन और लाभ मिलता है । इसी लिए आज विश्व के 177 देश जैविक खेती को अपना रहे हैं। वर्ष 1990 के बाद से विश्व भर में जैविक उत्पादों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। हमारे देश मे भी कृषि को लेके बहुत सारी योजनाएं, कार्यक्रम और प्रशिक्षण चल रहे हैं और इन्ही के माध्यम से अब जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है और अलग से फण्ड और सब्सिडी भी। बहुत सारी NGO, निजी कंपनियां और संस्थाए भी जैविक कृषि पर प्रोजेक्ट्स कर रही है सरकार के योजनाओं के तहत। ‘विगत 3-4 वर्षों से शून्य लागत प्राकृतिक खेती (ZBNF) की भी शुरुआत हो चुकी है जिसका श्रेय कृषि के विशेषज्ञ सुभाष पालेकर जी को जाता है और उनके सम्मान में इसका नाम बदलकर अब SPNF (सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती) कर दिया गया है।’ ‘आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश शून्य लागत प्राकृतिक खेती में प्रशिक्षण और योजनाओं पर काफ़ी जोर दे रहें हैं और अग्रिणी हैं।’ हमारे जमीन व खेतों को रासायनिक खादों की लत लग चुकी है और उर्वरा शक्ति घट चुकी है, जैविक खेती करने पर शुरुआत में 2-3 साल पैदावार कम होती है फिर जमीन रिचार्ज हो जाती है और उर्वरा शक्ति बढ़ जाने से पैदावार भी बढ़ने लगती है। जैविक उत्पादों की मांग पढ़ रही है परंतु उपलब्धता कम होने से जैविक उत्पादों की कीमत बहुत अधिक होती है और उपभोक्ता को बहुत मंहगा पड़ता है। सरकार बहुत सारे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय किसान मेलों का आयोजन भी करती रहती जिससे जैविक उत्पादों को एक अच्छा मार्किट मिल सके और किसान लाभान्वित होकर प्रेरित हों जैविक खेती करने को। आज देश के हर राज्य के हर जिले में जैविक खेती कर अच्छी कमाई करने वाले किसानों का उदाहरण मिल जायेगा। लगभग सभी राज्यों में जैविक खेती अंगीकरण और प्रमाणीकरण का प्रोग्राम चल रहा है, छोटे किसान जिनके पास 4 हेक्टेयर या उस से कम जमीन है वो पूरे जमीन पर जैविक खेती कर सकते हैं क्यों कि जैविक खेती के लिए पर्याप्त गोबर की खाद, गौमूत्र व अन्य जैव खाद की पूर्ति होनी चाहिए जिससे पैदावार पर ज्यादा असर न हो और किसान जैविक खेती के प्रेरित रहे, पर जिन किसानों के 4 हेक्टेयर या उस से अधिक जमीन है वो थोड़े जमीन से शुरू कर के प्रतिवर्ष जैविक खेती के लिए जमीन बढ़ा कर आगमी 5-6 वर्षो में पूरी जमीन जैविक खेती कर सकते हैं साथ साथ जिन बची जमीन पर IPM (इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट-समन्वित कीट प्रबंधन) खेती का अभ्यास करना चाहिए जिस से रासायनिक खादों और कीटनाशकों का कम से कम प्रयोग कर रोगों और कीटों पर नियंत्रण किया जा सके और पैदावार भी बढ़ा सकें।